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एक सुरक्षित दलाल कौन है?

एक सुरक्षित दलाल कौन है?

थानों में दलालों की होगी नो इंट्री

बस्ती। थानों से दलालों को फटकने नहीं दिया जाएगा। अगर थाने के आसपास भी दलाल घूमते मिले तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। गृह विभाग ने थानों का माहौल दुरुस्त करने के लिए यह कदम उठाया है। आदेश दिया है कि ऐसे लोगाें को चिह्नित किया जाए, जो थानों में मध्यस्थ की भूमिका अदा करते हैं।
अमूमन देखा जाता है कि थानों में दलालों के माध्यम से काम करवाया जाता है। थाने के मुंशी से लेकर थानेदार या उनसे भी बडे़ अधिकारी के दलाल मुंहलगे होते हैं। किसी भी तरह का मामला होने पर वे तुरंत एक पक्ष की ओर से पैरवी में जुट जाते हैं। उनकी पैरवी सिर्फ संवेदना की वजह से या संबंधों की वजह से नहीं होती बल्कि, इसके पीछे वसूली का बड़ा खेल होता है। शासन के संज्ञान में यह तथ्य आ चुका है। बात चाहें मुकदमा दर्ज कराने की हो या किसी को प्रताड़ित करने की। यहां तक कि जांच में मनचाही रिपोर्ट लिखवाने, विवेचना में धारा कम कराने, अभियुक्त का नाम निकलवाने में दलालों की अहम भूमिका होती है। उनसे हर काम कराने के लिए अलग-अलग रेट है। इसकी जानकारी दलालों को बखूबी होती है। थानेदार उन्हें मुखबिर के तौर पर इस्तेमाल करता है और उन्हीं के सहारे वसूली भी करता है। दलालों के माध्यम से एसओ या अन्य अधिकारी को रुपये ऐंठने में अपेक्षाकृत अधिक सहूलियत होती है। हालांकि यह ‘प्रथा’ काफी दिनों चल रही है मगर, इधर कुछ दिनों से दलालों की भूमिका सुर्खियों में है। इसे देखते हुए गृह विभाग को टोकना पड़ा। डीआईजी विजय प्रताप सिंह के मुताबिक, गृह विभाग ने थाने के दलालों पर अंकुश लगाने के लिए कार्रवाई को कहा गया है। उसी थाने के स्टाफ से गोपनीय स्तर पर जानकारी जुटाई जा रही है कि कौन व्यक्ति दलाली में लिप्त है। उनकी लिस्ट बनाकर गृह विभाग को भेजी जाएगी। साथ ही उन पर स्थानीय स्तर पर भी कार्रवाई होगी। देखने वाली बात यह होगी कि तमाम अन्य फरमानों की इस पर भी पुलिस का तंत्र अमल कर पाता है कि नहीं। अगर खुद की कमाई का बेहद सटीक जरिया वह तोड़ती है तो यह बड़ी बात होगी। साथ ही उन लोगों के लिए राहत की बात होगी, जो दलालों के चंगुल में फंसकर जेब कटवा बैठते हैं।

बस्ती। थानों से दलालों को फटकने नहीं दिया जाएगा। अगर थाने के आसपास भी दलाल घूमते मिले तो उन्हें जेल भेज दिया जाएगा। गृह विभाग ने थानों का माहौल दुरुस्त करने के लिए यह कदम उठाया है। आदेश दिया है कि ऐसे लोगाें को चिह्नित किया जाए, जो थानों में मध्यस्थ की भूमिका अदा करते हैं।


अमूमन देखा जाता है कि थानों में दलालों के माध्यम से काम करवाया जाता है। थाने के मुंशी से लेकर थानेदार या उनसे भी बडे़ अधिकारी के दलाल मुंहलगे होते हैं। किसी भी तरह का मामला होने पर वे तुरंत एक पक्ष की ओर से पैरवी में जुट जाते हैं। उनकी पैरवी सिर्फ संवेदना की वजह से या संबंधों की वजह से नहीं होती बल्कि, इसके पीछे वसूली का बड़ा खेल होता है। शासन के संज्ञान में यह तथ्य आ चुका है। बात चाहें मुकदमा दर्ज कराने की हो या किसी को प्रताड़ित करने की। यहां तक कि जांच में मनचाही रिपोर्ट लिखवाने, विवेचना में धारा कम कराने, अभियुक्त का नाम निकलवाने में दलालों की अहम भूमिका होती है। उनसे हर काम कराने के लिए अलग-अलग रेट है। इसकी जानकारी दलालों को बखूबी होती है। थानेदार उन्हें मुखबिर के तौर पर इस्तेमाल करता है और उन्हीं के सहारे वसूली भी करता है। दलालों के माध्यम से एसओ या अन्य अधिकारी को रुपये ऐंठने में अपेक्षाकृत अधिक सहूलियत होती है। हालांकि यह ‘प्रथा’ काफी दिनों चल रही है मगर, इधर कुछ दिनों से दलालों की भूमिका सुर्खियों में है। इसे देखते हुए गृह विभाग को टोकना पड़ा। डीआईजी विजय प्रताप सिंह के मुताबिक, गृह विभाग ने थाने के दलालों पर अंकुश लगाने के लिए कार्रवाई को कहा गया है। उसी थाने के स्टाफ से गोपनीय स्तर पर जानकारी जुटाई जा रही है कि कौन व्यक्ति दलाली में लिप्त है। उनकी लिस्ट बनाकर गृह विभाग को भेजी जाएगी। साथ ही उन पर स्थानीय स्तर पर भी कार्रवाई होगी। देखने वाली बात यह होगी कि तमाम अन्य फरमानों की इस पर भी पुलिस का तंत्र अमल कर पाता है कि नहीं। अगर खुद की कमाई का बेहद सटीक जरिया वह तोड़ती है तो यह बड़ी बात होगी। साथ ही उन लोगों के लिए राहत की बात होगी, जो दलालों के चंगुल में फंसकर जेब कटवा बैठते हैं।

करण सिंह दलाल पहला चुनाव जीतने के बाद सिर्फ एक बार हारे, पांच बार जीते

करण सिंह दलाल पहला चुनाव जीतने के बाद सिर्फ एक बार हारे, पांच बार जीते

फरीदाबाद (बिजेंद्र बंसल)। पलवल विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक करण सिंह दलाल ऐसे नेता हैं जो छात्र जीवन से अब तक अंगद की तरह राजनीति में अपना पैर जमाए हुए हैं। 1991 में दलाल ने पहला चुनाव कांग्रेस के नित्यानंद शर्मा से जीता। दलाल ने तब हरियाणा में नवसृजित हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और 38.74 फीसद मत लेकर चुनाव जीता था।

दलाल ने अपना पहला चुनाव 1991 में तब जीता जब फरीदाबाद, गुरुग्राम, मेवात, पलवल जिलों में कांग्रेस की लहर थी। तब सिर्फ तावडू से जाकिर हुसैन निर्दलीय और दलाल हविपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। बाकी सीटों पर कांग्रेस के ही विधायक बने थे। अब तक दलाल ने छह चुनाव लड़े और सिर्फ एक ही चुनाव हारे हैं।

भजन लाल सरकार के खिलाफ किया संघर्ष

1991 में पलवल से विधायक बनकर करण दलाल तत्कालीन पलवल व फरीदाबाद समायोजित फरीदाबाद जिले में अपनी नई पार्टी हरियाणा विकास पार्टी के ध्वजवाहक बन गए। तत्कालीन भजन लाल सरकार के खिलाफ पूरे पांच साल फरीदाबाद, गुरुग्राम सहित दक्षिण हरियाणा में ऐसा आंदोलन खड़ा किया कि 1996 में हविपा और भाजपा गठबंधन की राज्य में सरकार बन गई। 1996 के चुनाव में हविपा-भाजपा गठबंधन के टिकट पर दलाल ने 50.64 फीसद मत लिए और उनके प्रतिद्वंद्वी बसपा के सुभाष चौधरी ने महज 17.42 फीसद ही मत लिए।

1999 में सीएम बनवाने के बाद चौटाला से बिगड़ गई

1999 में हविपा-भाजपा गठबंधन सरकार गिरी तो करण सिंह दलाल सरकार गिराने वालों में शामिल थे। दलाल के प्रयासों से ही तब ओमप्रकाश चौटाला सीएम बने मगर जब चौटाला के नेतृत्व वाले इनेलो का 2000 के चुनाव में भाजपा से गठबंधन हो गया तो दलाल भाजपा में शामिल हो गए। चौटाला के हस्तक्षेप से दलाल को तब टिकट नहीं मिला और दलाल ने आरपीआइ पार्टी से चुनाव लड़ा तथा इसमें भी जीत दर्ज की। दलाल की यह जीत तब इसलिए भी मायने रखती थी कि चौटाला ने कार्यवाहक सीएम रहते हुए अपने सबसे नजदीकी देवेंद्र चौहान को चुनाव लड़वाया था। दलाल 2000 से 2005 तक चौटाला सरकार के खिलाफ संघर्ष करते रहे।

2005 के चुनाव में जीत तो 2009 में हुई हार

दलाल को 2005 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जीत दर्ज हुई। तब दलाल को सर्वाधिक 57.31 और एक सुरक्षित दलाल कौन है? प्रतिद्वंद्वी सुभाष चंद को 29.36 फीसद मत मिले। इसके बाद 2009 के विधानसभा चुनाव में दलाल को तब शिकस्त मिली जब वे तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समधी बन चुके थे। 2009 में इनेलो के सुभाष चंद दलाल को 46.39 फीसद मत लेकर हराया। तब दलाल को 40.43 फीसद मत मिले। हालांकि दलाल 2014 के चुनाव में भी भाजपा के दीपक मंगला से चुनाव जीते।

हथियारों के दलाल थे राजीव गांधी: विकिलीक्स

विकिलीक्स ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में सनसनीखेज खुलासा किया है. विकिलीक्स ने आरोप लगाया है कि इंडियन एयरलाइन्स में काम करते हुए राजीव गांधी स्वीडन की एक कंपनी के लिए एजेंट का काम करते थे.

राजीव गांधी

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2013,
  • (अपडेटेड 08 अप्रैल 2013, 4:51 PM IST)

विकिलीक्स ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में सनसनीखेज खुलासा किया है. विकिलीक्स ने आरोप लगाया है कि एक सुरक्षित दलाल कौन है? इंडियन एयरलाइन्स में काम करते हुए राजीव गांधी स्वीडन की एक कंपनी के लिए एजेंट का काम करते थे.

एक अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' में छपी इस खबर के अनुसार वो स्वीडन की साब स्कानिया कंपनी के साथ जुड़े हुए थे. ये कंपनी भारत को लड़ाकू विमान बेचना चाहती थी. हालांकि ये सौदा नहीं हो सका था. उस रेस में ब्रिटिश कंपनी जुगआर ने बाजी मार ली थी.

इस खुलासे से बाद बीजेपी ने गांधी परिवार से जवाब मांगा है. बीजेपी का कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार और गांधी परिवार को सामने आकर सफाई देनी चाहिए.

गौरतलब है कि कुछ समय पूर्व कुथ लिंडस्ट्रोम ने वेबसाइट 'द हूट' को दिए साक्षात्कार में भी दावा किया था कि बोफोर्स तोप सौदे में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी के खिलाफ रिश्वत लेने के साक्ष्य नहीं हैं. लेकिन इटली के व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की के खिलाफ पर्याप्त सबूत होने के बावजूद उन्हें देश से सुरक्षित बाहर जाने दिया गया.

स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स पर भारतीय सेना को तोप सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकाने का आरोप है.

विकिलीक्स ने पूर्व रक्षामंत्री और समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस पर भी बड़ा खुलासा किया है. विकिलीक्स को मिले अमेरिकी केबल्स के मुताबिक- खुद को अमेरिकी विरोधी साबित करने वाले जार्ज फर्नांडिस ने आपात काल के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेसी सीआईए से मदद मांगी थी.

विकिलीक्स का खुलासा है कि सीआईए से पैसे लेने पर भी समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस को एतराज नहीं था. खुलासा है कि इंदिरा गांधी के आपात काल से लड़ने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस ने फ्रांसीसी सरकार से भी मदद मांगी.

गौरतलब है कि 1974 में रेलवे की हड़ताल को सफल बनाने में उस समय ऑल इंडिया रेलवेमैन फेडरेशन के अध्यक्ष जॉर्ज फर्नाडिंस का अहम योगदान था. इस हड़ताल से देश एक तरह से ठहर गया था और इसके कुछ समय बाद ही इंदिरा गांधी ने आपात काल की घोषणा की थी.

कांग्रेस ने किया खुलासे का खंडन
विकिलीक्स द्वारा देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लेकर किए गए खुलासे को कांग्रेस पार्टी ने खारिज कर दिया है. कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा है कि विकिलीक्स के आरोपों में कोई दम नहीं है. जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि आज एक प्रतिष्ठित अखबार ने अजीब सी खबर छापी है. मैं इसे लेकर निराश हूं. उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इसी रिपोर्ट में नीचे की पंक्तियों में लिखा है कि इन दावों की पुष्टि करने वाला कोई नहीं था तो यह खबर यहीं आधारहीन हो जाती है.

कांग्रेस महासचिव ने बीजेपी पर भी जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा, एक और रिपोर्ट सामने आई है, उसमें एनडीए के एक वरिष्ठ नेता पर इमरजेंसी के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA से आर्थिक मदद लेने का आरोप लगा है. तो क्या मैं यह मानूं कि बीजेपी के साथ-साथ इसकी जानकारी जयप्रकाश नारायण को भी थी. जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि देश में अफवाहें फैलाई जा रही हैं. उन्होंने बीजेपी नेताओं को सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दे डाली. उन्होंने कहा, 'बीजेपी, कांग्रेस की तरह नहीं है. बीजेपी बार-बार अपना चरित्र बदलती है.'

कौन सुरक्षित, कौन असुरक्षित है हिंदपीढ़ी में?

गिरिडीह का पचंबा फिलहाल सुर्खियों में है. यहां 12 जून की देर शाम हटिया रोड में दो समुदायों के बीच पथराव की घटना के बाद मोहल्ले के लोग डरे हुए हैं और इलाका छोड़ने की बात कह रहे हैं. 14 जून को यहां कुछ हिंदुओं ने अपने घरों के बाहर मकान बेचने का पोस्टर चिपका दिया. पचंबा के हिंदू बहुल इलाकों में कुछ समय से पथराव की घटनाएं हो रही हैं. एक मित्र ने रांची के हिंदपीढ़ी और कर्बला चौक इलाकों में हिंदुओं की घटती आबादी के बारे में मेरा ध्यान खींचते हुए आग्रह किया कि मैं इसके कारणों की पड़ताल करूं. इस बारे में आंकड़ों को जुटा पाना तो काफी श्रमसाध्य और शोध का विषय है, लेकिन मैंने वैसे लोगों से बात की जिनका परिवार पचंबा और हिंदपीढ़ी में कई दशकों से निवास कर रहा है.

उनसे जानने की कोशिश की कि इस इलाके की डेमोग्राफी में कितना और क्या अंतर आया है और हिंदुओं की घटती संख्या की वजह क्या है. और इस बात में कितनी सच्चाई है कि मुस्लिम बहुल बस्तियों में रहनेवाले हिंदू सुरक्षित नहीं हैं.

गिरिडीह के पचंबा से क्यों भागना चाहते हैं हिंदू

गिरिडीह के पत्रकार मनोज कहते हैं कि पचंबा मुसलिम बहुल इलाका है, लेकिन पहले यहां अभी जैसा तनाव नहीं था. हाल के दिनों में जमीन का कारोबार करनेवाले एक व्यक्ति और उसके गुर्गों के कारण ऐसे हालात पैदा हुए हैं.

यहां लंबे समय से दोनों समुदाय साथ रहते आये हैं. उनके घर, दुकानें और कारोबार भी वहीं हैं. लोग छोटे-मोटे कामों के लिए एक-दूसरे पर आश्रित हैं. सामाजिक तानाबाना टूटेगा तो इसका असर दोनों समुदायों पर पड़ेगा.

मनोज बताते हैं कि पचंबा में तनाव की वजह सांप्रदायिक से ज्यादा जमीन कारोबार से जुड़ी है ताकि हिंदू औनेपौने भाव अपनी संपत्ति दलालों को बेच जायें और वे उन्हें ऊंचे भाव में बेच सकें.

अपने-आप में एक अजूबा है हिंदपीढ़ी

रांची में पिछले हफ्ते जुमे की नमाज के बाद हुई तनावपूर्ण घटनाओं के बाद राजधानी की सबसे बड़ी मुसलमान बहुल बस्ती हिंदपीढ़ी में रहनेवाले हिंदुओं की स्थिति जानने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर पाल से बात की. सुधीर पाल का परिवार पिछले डेढ़ सौ साल से हिंदपीढ़ी में रहता आ रहा है. सुधीर ने हिंदपीढ़ी के इलाके में विभिन्न विषयों पर कई शोध भी किये हैं. वे बताते हैं कि हिंदपीढ़ी एक बहुत ही सघन आबादीवाला मुहल्ला एक सुरक्षित दलाल कौन है? है. करीब डेढ़ लाख की आबादी वहां निवास करती है.

हिंदपीढ़ी का इलाका मोटे तौर पर पुराने वेलफेयर सिनेमा (अभी के सैनिक मार्केट) से लेकर मेन रोड के संकटमोचन हनुमान मंदिर के पीछे काफी दूर पुरानी रांची की सीमा तक सटा हुआ है. इस बड़े इलाके में रांची नगर निगम के पांच-छह वार्ड शामिल हैं. सुधीर कहते हैं कि हिंदपीढ़ी अपने-आप में एक अजूबा है.

यहां सौ-सवा सौ तरीके के काम करनेवाले लोग रहते हैं. दर्जी हैं, तो जरी-कढ़ाई, कसीदाकारी करनेवाले भी. सब्जी-फल बेचनेवाले हैं, तो मांस-अंडा के कारोबारी भी, मैकेनिक-इलेक्ट्रीशियन हैं, तो बढ़ई-लोहार भी हैं. धुनिया-प्लंबर, पेंटर, कारीगर, बैंड बाजेवाले से लेकर लाइटवाले सब यहां भरे पड़े हैं. इसे आर्टीजन की बस्ती कहा जाये, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

हिंदपीढ़ी में 150 साल से हैं, कभी डर नहीं लगा

दिन हो रात, हिंदपीढ़ी इलाका हमेशा गुलजार रहता है. सुधीर बताते हैं कि मजाक में हम लोग कहते हैं कि हिंदपीढ़ी कभी सोती नहीं. देर रात ट्रेन आदि से रांची आने पर हम लोग पीपी कंपाउंड के पीछे के रास्ते से ओसीसी कंपाउंड स्थित अपने घर जाते हैं, क्योंकि चाहे जितनी भी रात हो, वहां लोगों की आवाजाही दिखती है. जबकि मेन रोड के सन्नाटे में जाने में डर लगता है. वे कहते हैं कि बाहर से लोगों को लगे कि हिंदपीढ़ी कम्यूनल एरिया है, लेकिन हमलोग पिछले 150 साल से यहां रह रहे हैं. हमें कभी डर या अलग-थलग पड़ जाने का अहसास नहीं हुआ.

सुधीर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि यहां सभी लोग अच्छे ही हैं, यहां बुरे लोग भी हैं, लेकिन ऐसे लोग हर जगह होते हैं. ओवरऑल देखें, तो हिंदपीढ़ी एक ऐसा इलाका है, जहां आप रात के 12 बजे भी जा सकते हैं और बहुत सुरक्षित होकर जा सकते हैं.

इस तानेबाने को कोई तोड़ना नहीं चाहता

हिंदपीढ़ी की करीब 90 फीसदी आबादी मुसलमानों की है. जीवन-यापन और दूसरी जरूरतों के लिए यहां के मुसलमानों की निर्भरता जितनी हिंदुओं पर है, उतने ही निर्भर यहां के हिंदू भी मुसलमानों पर हैं. कुछ दिन पहले एक संस्था द्वारा कराये गये शोध के अनुसार करीब 100 तरह के ऐसे काम हैं, जिनके लिए यहां रहनेवाले हिंदू और मुसलमान एक दूसरे पर निर्भर हैं.

कभी वे ग्राहक होते हैं और कभी सप्लायर. इस फैब्रिक को यहां कोई तोड़ना नहीं चाहता. दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के यहां शादी-विवाह और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं.

कोरोना के लॉकडाउन के पहले हिंदपीढ़ी के मुसलिम युवकों ने एक हिंदू बच्चे के इलाज के लिए करीब दो महीने तक ऑटो रिक्शा में घूम-घूम एक सुरक्षित दलाल कौन है? कर पैसा इकट्ठा किया था. यह अकेली घटना नहीं है. लंबे समय लोग एक-दूसरे की मदद करते चले आ रहे हैं.

चंद तात्कालिक घटनाओं से धारणा बनाना सही नहीं

पत्रकार कुमार सौरभ का परिवार मूल रूप से हिंदपीढ़ी का रहनेवाला है. अब वे वहां नहीं रहते, लेकिन हिंदपीढ़ी को लेकर सौरभ के विचार भी कमोबेश सुधीर की तरह ही थे. लेकिन बड़ा सवाल यह था कि इतने सौहार्द्र और सद्भाव के बाद भी माहौल क्यों बिगड़ा और मेन रोड पर बने संकट मोचन हनुमान मंदिर और काली मंदिर पर पत्थरबाजी की घटना कैसे हुई. इस पर सुधीर कहते हैं कि यह एक तात्कालिक घटना थी.

भीड़ में कहां के और कैसे तत्व घुस गये थे, इसका पता पुलिस लगा रही है. इसके अलावा देश में अभी जिस प्रकार का माहौल है, वह भी इसका कारण हो सकता है. पहले भी चंद ऐसी तात्कालिक घटनाएं हुई हैं, लेकिन इससे हिंदपीढ़ी के सोशल एक सुरक्षित दलाल कौन है? फैब्रिक पर कोई खास असर नहीं पड़ा है.

तो हिंदपीढ़ी से क्यों घटती जा रही है हिंदू अबादी

यह एक अलग तरीके का इकोनॉमिक्स है. जो जमीन दलाल हैं या जो रियल एस्टेट के कारोबार में हैं, उन्हें पता है कि हिंदपीढ़ी एक प्राइम लोकेशन है. हिंदू यहां माइनॉरिटी हैं. ऐसे दलालों और कारोबारियों को लगता है कि अगर यहां का भय का माहौल पैदा नहीं होगा, तो औनेपौने दाम में जमीन नहीं मिलेगी. इसलिए ऐसी बातें फैलायी जाती हैं. जो लोग बाहर से हिंदपीढ़ी को देखते हैं, वे उसी तरीके से इसे प्रोजेक्ट भी करते हैं.

हिंदपीढ़ी के रहनेवाले एक सज्जन बताते हैं कि उन्हें रोज परिचितों के फोन आते हैं कि सुना कि आपके मोहल्ले में कोई तलवार लेकर घुस गया या कहीं कुछ हो गया. जबकि ऐसा कुछ होता नहीं है. इसे कम्यूनल एंगल से देखना सही नहीं होगा, यह जमीन माफिया का विशुद्ध कारोबार है, जो भय पर आधारित है.

हिंदपीढ़ी में मुस्लिम समुदाय के काफी लोग अच्छे-खासे पैसेवाले हैं, जो जमीन या घर के लिए कैश पैसा देने को तैयार रहते हैं. इसलिए भी भय बनाया जाता है ताकि हिंदुओं की संपत्ति को औनेपौने दाम में खरीद कर ऊंचे दाम में बेच दिया जाये.

इसके अलावा हिंदपीढ़ी में जो हिंदू बसे हैं, उनमें ज्यादातर लोग तीन-चार पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं. परिवार बढ़ने के कारण बंटवारा भी होता गया, और नौकरी और अन्य कारणों से लोग बाहर रहने लगे.

जब रहनेवाला कोई बचा नहीं, तो ऐसे परिवार भी अपनी संपत्ति बेचने लगे. यहां रहनेवाले हिंदू ऐसी संपत्ति की ज्यादा कीमत नहीं देना चाहते, जबकि मुसलमान अच्छे दाम देते हैं. यह भी हिंदुओं की घटती संख्या का एक प्रमुख कारण हो सकता है.

हिंदपीढ़ी में बन रहे हैं फ्लैट, बस रहे हैं हिंदू

और ऐसा नहीं है कि हिंदपीढ़ी में हिंदू आना नहीं चाहते. सुधीर पाल बताते हैं कि उनके ही इलाके ओल्ड कमिश्नर्स कंपाउंड, घोष कंपाउंड में कई रिहाइशी फ्लैट बने, बुधिया की बड़ी इमारत बन गयी. अगर स्थिति खराब होती, तो ये चीजें नहीं बनतीं. इतना ही डर का माहौल होता, तो हिंदू एक सुरक्षित दलाल कौन है? परिवार 40-50 लाख का फ्लैट लेकर क्यों यहां रहने आते.

लेकिन जिस तरह हर आदमी दूसरे को सांप्रदायिकता के चश्मे से देख रहा है, हर बात को धर्म से जोड़ कर राजनीति की जा रही है और इसे सामाजिक मान्यता मिल रही है, ऐसे माहौल में हिंदपीढ़ी और इस जैसी बाकी जगहों की सोशल फैब्रिक को जोड़ कर रखनेवालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है.

मरीजों की दलाली को लेकर माधव डिस्पेंसरी में हुआ देर रात खून खराब

ग्वालियर। नईदुनिया प्रतिनिधि माधव डिस्पेंसरी के बाहर बीती रात को मरीज को एक निजी अस्पताल में शिफ्ट करने को लेकर दलालों के बीच जमकर खून खराबा हुआ। इसमें तीन लोग घायल हुए जिसमें से एक के पैर की हड्डी टूटने पर ट्रॉमा सेन्टर में भर्ती किया गया। पैर की हड्डी जोड़ने के लिए उसका ऑपरेशन होना था। डॉक्टरों ने पूरी तैयारी भी ओटी में कर रखी थी पर ज

मरीजों की दलाली को लेकर माधव डिस्पेंसरी में हुआ देर रात खून खराब

ग्वालियर। नईदुनिया प्रतिनिधि

माधव डिस्पेंसरी के बाहर बीती रात को मरीज को एक निजी अस्पताल में शिफ्ट करने को लेकर दलालों के बीच जमकर खून खराबा हुआ। इसमें तीन लोग घायल हुए जिसमें से एक के पैर की हड्डी टूटने पर ट्रॉमा सेन्टर में भर्ती किया गया। पैर की हड्डी जोड़ने के लिए उसका ऑपरेशन होना था। डॉक्टरों ने पूरी तैयारी भी ओटी में कर रखी थी पर जब मरीज को लेकर पहुंचे तो पता चला कि मरीज बैड से गायब है। उसे कुछ लोग एक एंबुलेंस के डालकर ले गए। हालांकि इस मामले में पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू कर दी है। इस झगड़े से मरीजों की दलाली का खेल सबके सामने खुल गया और इसमें कौन कौन लिफ्त हैं यह अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे में कैद हो चुका है॥

विवाद का कारण मरीजों की दलाली-

रात करीब दो बजे एक मरीज कैजुअल्टी पहुंचा था। वहां पर निजी अस्पताल के दलाल घूम एक सुरक्षित दलाल कौन है? रहे थे। दो अलग अलग अस्पताल के दलालों ने उस मरीज को अपने अपने अस्पताल ले जाने के लिए समझाना शुरू कर दिया। इसी बीच अस्पताल स्टाफ के कुछ लोग जो निजी अस्पतालों में चोरी छिपे मरीज भेजते वह भी आ गए। उन्होंने एंबुलेंस बुलाकर मरीज को अपने मनपसंद स्थान पर शिफ्ट करने का प्रयास किया। जिसको लेकर तीनों के बीच मुहंबाद हुआ फिर लाठी,डंडे चलने लगे। अस्पताल का स्टाफ तो वहां से खिसक गया पर दोनों निजी अस्पताल के दलालों में जमकर खून खराबा हुआ। उस समय कैजुअल्टी स्टाफ ने पुलिस को बुलाने का प्रयास किया पर ट्रॉमा की चौकी में कोई पुलिसवाला मौजूद नहीं था। तब 100 डायल को सूचना दी गई। जब पुलिस आई तबतक एक पक्ष तो भाग निकला पर दूसरे पक्ष के ज्ञानेन्द्र रावत के पैर की हड्डी टूटने से वहीं पड़ा रह गया। कंपू पुलिस ने उपदेश बघेल की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर ि लया और ज्ञानेन्द्र रावत को ट्रॉमा में भर्ती करवा दिया था।

डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर की पोस्ट-

डॉ धुआंराम गुर्जर ने एक वॉटसएप्प गु्रप पर पोस्ट भी डाला। 10 फरवरी की रात 3 बजे कैजुअल्टी माधव डिस्पेंसरी जयारोग्य अस्पताल परिसर के अंदर कुछ दलाल एवं असमाजिक तत्वों ने आकर जेएएच परिसर में भय का वातावरण बनाय। बदमाश रोड, डंडे लेकर घूम रहे थे उस दौरान माधव डिस्पेंसरी के बाहर लड़ाई हुई और मारपीट हुई। जिसमें एक लड़का ज्ञानेन्द्र रावत का पैर फैक्चर हुआ और उस में बहुत ज्यादा मार दी उसका मेरे द्वारा मेडिकल परीक्षण किया गया। उसमें लेफ्ट थाई फीमर बोन फैक्चर है। उस दौरान मैंने जाकर चौकी में देखा तो कोई पुलिसवाला मौजूद नहीं था। उसके बाद पुलिस को फोन कर बुलावाया तब जाकर सुबह 6 बजे एक पुलिस वाला आया। डॉ धुआंराम का कहना था हमारी सुरक्षा के लिए न तो पुलिस थी न गार्ड। बदमाश बेखौप होकर मारपीट कर रहे थे और हम सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे थे। जूडा अस्पताल की सुरक्षा को लेकर ज्ञापन देगा।

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रात में जेएएच परिसर में झगड़ा हुआ था उसमें शिकायत दर्ज कर ली है और एक सुरक्षित दलाल कौन है? घायल को ट्रॉमा में भर्ती करवा दिया है।

विनय शर्मा, थाना प्रभारी कंपू

मुझे आपके माध्यम से जानकारी मिली है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। यदि दलाली हो रही है तो मैं पता कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता हूं।

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