ट्रेडिंग फॉरेक्स के लाभ

प्रसार कम है

प्रसार कम है

मुद्रा का प्रसार एवं मापन

मुद्रा का प्रसार एवं मापन :- किसी भी समय अर्थव्यवस्था में कुल मुद्रा को मापने के लिए केन्द्रीय बैंक कुछ मापक का प्रयोग करते हैं। भारत के संदर्भ में रिजर्व बैंक द्वारा 1977 में एक वर्क फोर्स का गठन किया गया, जिसके द्वारा बाजार में किसी समय पर कितनी मुद्रा उपलब्ध है, मापने के लिए 4 मापक तय किये गए जिन्हें M1, M2, M3 एवं M4 नाम से जाना जाता है। मुद्रा के मापन को समझने से पहले अर्थव्यवस्था में तरलता शब्द को समझना आवश्यक है।

अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity) – अर्थव्यवस्था में तरलता दो प्रकार से हो सकती है –

1. बाजार की तरलता – किसी भी समय अर्थव्यवस्था में उपलब्ध मुद्रा की कुल मात्रा को तरलता कहा जाता है। यदि तरलता अधिक है तो मुद्रास्फीति की स्थित उत्पन्न हो सकती हैं जबकि तरलता कम होने की स्थिति में अपस्फीति या मंदी आ सकती है।

2. मुद्रा की तरलता – मुद्रा की तरलता से संदर्भ मुद्रा के व्यय होने में लगने वाले समय से है। यदि समय कम लग रहा है तो वह मुद्रा अधिक तरल है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति के पास नगद, क्रेडिट कार्ड एवं सोने के रूप में परिसंपत्तियां (मुद्रा) उपलब्ध हैं तो नगद सबसे अधिक तरल (क्योंकि नगद सबसे जल्दी और आसानी से खर्ची जा सकती है), क्रेडिट कार्ड कुछ कम तरल और सोने की तरलता सबसे कम मानी जाएगी।

मुद्रा का मापन

1. M1= CU (Coins and Currency) + DD (Demand and Deposit)

CU अर्थात लोगों के पास उपलब्ध नगद (नोट एवं सिक्के), DD अर्थात व्यावसायिक बैंकों के पास कुल निवल जमा एवं रिजर्व बैंक के पास अन्य जमाये। निवल शब्द से बैंक के द्वारा रखी गयी लोगों की जमा का ही बोध होता है और इसलिए यह मुद्रा की पूर्ति में शामिल हैं। अंतर बैंक जमा, जो एक व्यावसायिक बैंक दूसरे व्यावसायिक बैंक में रखते हैं, को मुद्रा की पूर्ति के भाग के रूप में नहीं जाना जाता है।

2. M2= M1 + डाकघर बचत बैंकों की बचत जमांए

3. M3= M1 + बैंक की सावधि जमाये(FD)

4. M4= M3 + डाकघर बचत संस्थाओं में कुल जमा राशि (राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्रों को छोड़कर)

M1 से M4 की तरफ जाने पर मुद्रा की तरलता घटती है, परन्तु बाजार की तरलता बढ़ती जाती है।

M1>M2>M3>M4

संकुचित मुद्रा (Narrow Money)= M1 को संकुचित मुद्रा भी कहते है क्योंकि मात्रा में ये अन्य सभी से सबसे कम होती है, अर्थात इसमें पैसा सबसे कम होता है।

वृहद/बड़ी मुद्रा (Broad Money)= M3 को वृहद मुद्रा कहते है। सामान्यतः वृहद मुद्रा M4 को होना चाहिए परन्तु M1 से M4 तक जाते जाते उसे प्रयोग करना कठिन हो जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि उसकी (M4) की तरलता इतनी कम है कि उसे प्रयोग नहीं किया जा सकता अतः M3 को ही वृहद मुद्रा कहा जाता है।

मुद्रा के प्रकार- मुद्रा को कई आधारों पर कई वर्गों में बाँटा जा सकता है। यहां पर प्रसार कम है हम मुद्रा की भौतिक स्थिति एवं मांग के आधार पर मुद्रा का वर्गीकरण बता रहें हैं-

  1. धात्विक – इसमें सभी सिक्के आते हैं।
  2. कागजी – सभी नोट आते हैं।
  3. प्लास्टिक – क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड आते हैं।
  4. बुरी मुद्रा – इसमें सभी कटे फटे नोट आते हैं।
  5. अच्छी मुद्रा – इसके अंतर्गत नये नोट आते हैं।
    अच्छी और बुरी मुद्रा के सम्बन्ध में अर्थशास्त्री ग्रेसम्स ने एक नियम बताया था। जिसे ग्रेसम्स के नियम के नाम से जाना जाता है।
    ग्रेसम्स का नियम- किसी भी अर्थव्यवस्था में बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर निकाल देती है तथा उसका स्थान ले लेती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के पास पुरानी कटी-फटी मुद्रा (बुरी मुद्रा) है तो वह प्रसार कम है उसे ही पहले प्रयोग में लाने का प्रयास करेगा न की नई मुद्रा (अच्छी मुद्रा) को, इस प्रकार बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है।
  6. गर्म मुद्रा – जिस मुद्रा की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग अधिक हो उसे गर्म मुद्रा कहा जाता है। उदाहरण के लिए डॉलर।
  7. ठण्डी मुद्रा – जिस मुद्रा की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मांग कम हो उसे ठण्डी मुद्रा कहा जाता है।

विदेशी मुद्रा

हर देश की मुद्रा का अलग मूल्य होता है जोकि उस देश के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसके उत्पादन हिस्से के आधार पर तय होता है। सामान्य भाषा में जब किसी देश की मुद्रा का हिस्सा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक होगा तो उसका मूल्य भी अधिक होगा जैसे अमेरिका जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 20% हिस्सेदारी है, जबकि भारत की कुल 2% है।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य निर्धारण

1. बाजार द्वारा मुद्रा का मूल्य निर्धारण – अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में किसी देश की मुद्रा की मांग के आधार पर उसके मूल्य का निर्धारण किया जाता है। इसे प्रवाही विनिमय दर(Floating exchange rate) कहते हैं। प्रवाही इसलिए क्योंकि यह दर कम ज्यादा होते रहती है। किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य निरपेक्ष(अकेले) नहीं होता वो हमेशा दूसरी मुद्रा के सापेक्ष होता है, अर्थात प्रसार कम है एक देश की मुद्रा की दूसरे देश के मुद्रा के साथ तुलना की जाती है इसे विनिमय दर(Exchange rate) कहते हैं। जैसे 1$=74रू0

2. सरकार द्वारा मुद्रा का मूल्य निर्धारण – कभी-कभी सरकारें भी जानबूझकर अपने देश की मुद्रा का मूल्य कम या ज्यादा कर देती है। ऐसा उस देश की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है –

प्रसार शिक्षा के कितने चरण है?

इसे सुनेंरोकेंगृह विज्ञान प्रसार कार्यकर्ता को प्रसार शिक्षण के पहले की स्थिति एवं शिक्षण के बाद की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करना होता है उसके पश्चात उसकी कमियों पर पुनर्विचार किया जाता है। और आगे के कार्यक्रम तैयार करते समय उन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस प्रकार गृह विज्ञान प्रसार शिक्षण के सभी चरण एक-दूसरे से संबंधित है।

प्रसार शिक्षा का क्या महत्व है?

इसे सुनेंरोकें, प्रसार शिक्षा व्यक्ति को नई खोजों, वैज्ञानिक तरीकों ज्ञान व तकनीकी को अपनाने हेतु प्रोत्साहित करती है। प्रसार कार्यकर्ता वैज्ञानिकों व ग्रामीण लोगों के बीच का अंतर कम करता है। इसलिए स्वैच्छिक भागीदारी तथा नई तकनीकों को अपनाने और बदलाव हेतु विचार को प्रोत्साहन देना प्रसार शिक्षा का मुख्य सिद्धांत है।

प्रसार कार्यकर्ता क्या है?

इसे सुनेंरोकेंवे सभी व्यक्ति जो समाज या किसी समुदाय में प्रसार कार्य करते हैं प्रसार कार्यकर्ता कहलाते हैं या इस प्रकार भी कह सकते हैं कि वे लोग जो समुदाय में शिक्षा या सेवा प्रदान करने का कार्य करते हैं प्रसार कार्यकर्ता कहलाते हैं।

शिक्षा क्या है और शिक्षा का असली अर्थ क्या है?

इसे सुनेंरोकेंएजुकेशन का अर्थ है शिक्षित करना । अर्थात शिक्षा वह है जो हमें शिक्षित एवं प्रशिक्षित करती है। एडु केयर ( Educare ) शब्द का अर्थ है आगे बढ़ना या विकसित करना । अर्थात शिक्षा वह है जो लक्ष्य को ध्यान में रखकर बालकों का विकास करती है।

भारत में प्रसार शिक्षा के जनक कौन हैं?

इसे सुनेंरोकेंप्रसार शिक्षा के जनक जे० पाल० लीगन है।

प्रसार कार्यक्रम में कितने विशेषता चरण होते हैं?

इसे सुनेंरोकेंप्रसार शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ यह सुविचारित बदलावों की नियोजित प्रक्रिया है। यह शिक्षा उपयोगी प्रयोगात्मक वैज्ञानिक ज्ञान, नई पद्धतियों तथा प्रौद्योगिकी पर केंद्रित रहती है। यह लोगों की प्रायोगिक समस्याओं का समाधान करता है और लोगों को सकारात्मक प्रयासों के लिए प्रोत्साहित करता है।

प्रसार शिक्षा से आप क्या समझते हैं इसके क्षेत्र तथा महत्व का वर्णन कीजिए?

इसे सुनेंरोकेंइस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रसार शिक्षा मुख्यत: ग्रामीण लोगों के लिए एक शिक्षा है जिसके द्वारा व्यक्ति का विद्यालय जाए बिना आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास संभव है। प्रसार का अर्थ है उन लोगों में विभिन्न नई तथा उपयोगी तकनीकों का प्रसार करना जो लोग नियमित विद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं जा सकते हैं।

प्रसार शिक्षा का सिद्धांत क्या है?

इसे सुनेंरोकेंप्रसार शिक्षा के सिद्धांत का तात्पर्य उन कार्यों से है जो प्रसार कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आवश्यक होते हैं। अतः ऐसे कार्य जो मनुष्य का विकास इस प्रकार से करें कि वह स्वावलंबी व आत्मनिर्भर होकर अपना व अपने परिवार तथा समाज का विकास कर सकें, प्रसार शिक्षा के सिद्धांत कहलाते हैं।

कार्यकर्ता कितने प्रकार के होते हैं?

इसे सुनेंरोकेंउपचार प्रक्रिया:- कार्यकर्ता दो प्रकार से सेवार्थी की उपचार प्रक्रिया मंे भाग लेता हैः-प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष। जब वह सेवार्थी के पर्यावरण से सक्रिय सम्बन्ध स्थापित करता है तो विभिन्न भूमिकाएँ निभाता है। 1.

प्रसार शिक्षा के जनक कौन है?

इसे सुनेंरोकेंपाल लीगन (1961), जोकि प्रसार शिक्षा के जनक माने जाते हैं, उन्होंने बताया कि प्रसार शिक्षा एक व्यवहारिक व सामाजिक विज्ञान है, जिसमें शोध से प्राप्त प्रासंगिक सामग्री, क्षेत्र के अनुभव व प्रासंगिक सिद्धांत, उपयोगी तकनीकों का संश्लेषण तथा विचार व प्रतिक्रियाएं आती हैं जिससे कि व्यक्ति किसी भी विद्यालय या विश्वविद्यालय में …

इम्यूनज़ैशन (टीकाकरण )

Vaccination of Shyamlata Madavi's baby.

शिशुओं को जीवित रहने के लिए टीकाकरण जरूरी है। नियमित टीकाकरण को छोड़ने से नवजात के जीवन पर जानलेवा प्रभाव पड़ सकता है। शिशुओं के जीवन और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए टीकाकरण सबसे प्रभावी और कम लागत का तरीका है। विश्व में आधे से अधिक बच्चे खतरें की परिस्थिति और स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक टीका प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। यदि शिशु का टीकाकरण किया जाए तो विश्व में उनके बचाव में लगभग 15 लाख शिशु मृत्यु को रोका जा सकता है।

विगत दो दशकों में भारत ने स्वास्थ्य सूचकों,खास करके शिशु स्वास्थ्य से संबंधित सूचकों में सुधार करने के दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति किया है। भारत को सन 2014में पोलियो मुक्त और सन 2015 में मातृत्व व नवजात टेटनस उन्मूलन का सर्टिफिकेट मिला।

टीकाकरण परिवार और समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। अपने शिशुओं का टीकाकरण करके हम अपने समुदाय के सबसे अधिक जोखिम ग्रस्त सदस्य जैसे नवजात शिशु की सुरक्षा करते हैं।

पूर्ण टीकाकरण को गति प्रदान करके वंचित लोगों तक पहुँच बनाने के लिए भारत सरकार ने एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम,मिशन इंद्रधनुष,प्रारंभ किया है। यह लाभार्थियों की संख्या,भौगोलिक पहुँच और टीकों की मात्रा के आधार पर विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम है,जिसमें प्रतिवर्ष लगभग 2 करोड़ 70 लाख नवजात शिशुओं को लक्षित किया जाता है।

संपूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए प्रति वर्ष भारत में 90 लाख से भी अधिक टीकाकरण सत्रों का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत नीमोकॉक्कल कन्ज्यूगेट वैक्सीन (पीसीवी) और रोटावायरस वैक्सीन (आरवीवी) जैसे नए टीकों को भी शामिल किया गया है। इसके तहत एक देशव्यापी मीजल्स-रूबेला अभियान भी चलाया जा रहा है। जिससे सभी बच्चों को लक्षित किया गया है चाहे उनका आवास कही भी हो।

इस प्रगति के बावजूद भी भारत में शिशु मृत्यु दर और अस्वस्थता में संक्रामक बीमारियों की उच्च भागीदारी है।

भारत में लगभग 10लाख बच्चे अपने पांचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही मर जाते हैं। इनमें से चार में से एक की मृत्यु निमोनिया और डायरिया के कारण होती है जो विश्व भर में शिशु मृत्यु के दो प्रमुख संक्रामक बीमारी है। इनमें से अधिकांश को शिशु स्तनपान टीकाकरण एवं उपचार देकर बचाया जा सकता है।

जीवन के पहले वर्ष में भारत में केवल 65प्रतिशत शिशुओं को ही संपूर्ण टीकाकरण मिल पाता है। हालांकि,जीवन बचाने और बीमारियों से बचाव की टीकाकरण की क्षमता के स्पष्ट साक्ष्य मौजूद हैं। फिर भी,विश्व भर में लाखों छोटे शिशु टीकाकरण से वंचित रह जाते हैं जो उन्हें और समुदाय को बीमारियों एवं महामारी के खतरे में डाल सकता है। आज जब विश्व में कम दाम पर जीवन रक्षक टीका उपलब्ध हैं तो यह अस्वीकार्य होना चाहिए।

भारत के विभिन्न राज्यों में टीकाकरण की दर अलग-अलग है और मध्य,बड़े भारत के राज्यों में सबसे कम है। अल्प टीकाकृत या गैर-टीकाकृत शिशुओं की अधिकांश संख्या बड़े राज्यों जैसे बिहार,मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश और राजस्थान में है।

टीकाकरण में कमी के कारण भौगोलिक,क्षेत्रीय,ग्रामीण-शहरी,गरीब-अमीर और लिंग संबंधित है। औसतन लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को कम टीकाकरण प्राप्त होता है और हाइट बर्थ ऑर्डर शिशुओं का टीकाकरण अपेक्षाकृत कम होता है।

एनएफएचएस 4, 2015-16 के अनुसार संपूर्ण टीकाकरण की राष्ट्रीय औसत 62 प्रतिशत है। डीपीटी-3पहुँच की 78.4 प्रतिशत और मीजल्स के पहले डोज की पहुँच 81.1प्रतिशत है। संपूर्ण टीकाकरणके लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ नई चुनौतियाँ हैं जैसे कि कार्यकर्ताओं की सीमित क्षमता खासकर खराब प्रदर्शन वाले बड़े राज्यों और ज़मीनी स्तर के,इसके अलावा माँग का सही आंकलन नहीं कर पाना,संसाधनों एवं कोल्ड चेन प्रबंधन जिसके कारण टीकों के नष्ट होने का दर अधिक है। भारत में टीके के माध्यम से रोके जाने वाले बीमारियों की ट्रैकिंग करने के प्रभावी तंत्र का भी अभाव है।

सभी शिशुओं के बचाव एवं फलने-फूलने के लिए सुरक्षा देना

विगत 70वर्षों में टीकाकरण यूनिसेफ के कार्य के केंद्र में रहा है। विश्व भर में शिशुओं के लिए सेवाओं को प्रदान करने के लिए इससे बढ़कर कोई संस्था नहीं है। यूनिसेफ भारत सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम का तकनीकी साझेदार है और यह सरकार को सहयोग करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि टीकाकरण के द्वारा सुरक्षित किए जाने वाले बीमारियों से कोई भी शिशु प्रभावित न हो सके।

सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए टीकाकरण का प्रसार महत्वपूर्ण है। एक समय हजारों बच्चों की जान लेने वाली बीमारियां,पोलियो और स्मॉल पॉक्स का उन्मूलन किया जा चुका है एवं प्राथमिक रूप से सुरक्षित व प्रभावी टीकों के कारण अन्य बीमारियां भी उन्मूलन के कगार पर हैं।

यूनिसेफ भारत सरकार एवं अन्य साझेदारों के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का भी सहयोगी है। यूनिसेफ जीएवीआई को प्रस्तावना विकास,वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन एवं प्रसार कम है क्रियान्वयन के माध्यम से सहयोग करता है। यूनिसेफ,राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह,टीकाकरण एक्शन समूह और पोलियो विशेषज्ञ सलाहकार समूह में नीति विकास का एक सक्रिय सदस्य है।

यूनिसेफ सभी जगह सभी लड़कों और लड़कियों के लिए नियमित टीकाकरण पहुँच में सुधार करके,उनके जीवन को बचा कर,बाल अधिकार की वचनबद्धता को सुनिश्चित करता है। यह अपने सहयोगी एवं साझेदारों के साथ मिलकर सभी भौगोलिक स्थानों,ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में गरीबों,वंचितों,कम पढ़े लिखे समूहों में टीकाकरण की कमियों को समाप्त करने के लिए कार्यरत है। ऐसा करके यह सुनिश्चित करता है कि वह सभी शिशु जो टीकाकरण के लिए आते हैं उन्हें आवश्यक व पर्याप्त टीका के सभी डोज मिल सके। ऐसा करने के लिए सभी स्तर पर आवश्यक संसाधनों जैसे टीकाकरण करने वाले,आपूर्ति,कौशल,मोटिवेशन और सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल है।

पूरे विश्व में टीका एवं स्वास्थ्य तंत्र पर लोगों का भरोसा बढ़ाने और बनाए रखने के लिए,टीका के लाभ व संबंधित खतरों एवं साक्ष्य आधारित सूचनाओं के प्रसार से मदद मिल सकती है। यही कारण है कि यूनिसेफ- मीडिया,विशेष करके रेडियो,एवं आस्था आधारित संगठनों व सामुदायिक नेतृत्व एवं प्रभावी व्यक्तियों के साथ साझेदारी करता है ताकि टीकाकरण के लाभ से संबंधित तथ्यात्मक जानकारियों को साझा किया जा सके।

यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि टीकाकरण के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाई जाए और अभिभावकों और देखरेखकर्ताओंके पास टीकाकरण चक्र के बारे में आवश्यक जानकारी उपलब्ध हो,उन्हें यह पता होना प्रसार कम है चाहिए कि अपने शिशु को टीकाकरण के लिए कब और कहाँ लाना है। टीकाकरण के बीच का अंतराल क्या है,इसकी डोज क्या है और टीकाकरण सत्र को नहीं छोड़ने के क्या महत्व हैं।

टीकाकरण के क्षेत्र में यूनिसेफ के भारतीय तकनीकी सहयोग में नया जुड़ाव मीजल्स-रूबेला टीकाकरण का हुआ है। इस बिमारी के प्रसार में विश्व भर में एक खतरनाक वृद्धिहुई है यहाँ तक कि वैसे देशों में भी जहाँ इसका उन्मूलन हो चुका था या यह उन्मूलन के कगार पर थी। मीजल्स-रूबेला (एमआर) टीकाकरण सुरक्षित और प्रभावी है। फरवरी 2017 से अब तक भारत में 32 राज्यों में 23 करोड़ शिशुओं को एमआर टीका का डोज दिया जा चुका है। इस अभियान में उपयोग किया जाने वाले एमआर वैक्सीन का निर्माण भारत में किया गया है एवं उसे विश्वभर में उपयोग के लिए निर्यात भी किया गया है।

एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम अभियान के बाद संपूर्ण टीकाकरण आच्छादन में 18.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मिशन इंद्रधनुष से प्राप्त अनुभवों को देशभर में टीकाकरण से छूट चुके शिशुओं को टीकाकरण में शामिल करने और संपूर्ण टीकाकरण आच्छादन को 90 प्रतिशत तक स्थाई बनाने के लिए उपयोग किया जा रहा है।

शिशु मृत्यु दर को कम करने वाले पहल में टीकाकरण तक पहुँच को सुधारने के लिए भारत की वचनबद्धता महत्वपूर्ण है और सरकार के उच्च स्तर पर टीकाकरण की प्रधानता दी जाती है। 190जिलों में यह मिशन इंद्रधनुष चलाया गया था। नियमित व प्रभावी टीकाकरण से भारत को प्रभावित करने वाले कई बीमारियों का उन्मूलन किया जा सकता है।

समुद्र तल के विस्तार का प्रसार 35% तक धीमा

इसके लिए शोधकर्ताओं ने विस्तारित हो रहे 18 विशाल कटकों (ridges) का चयन किया। इसके तहत महासागरीय पर्पटी (oceanic crust) पर मौजूद शैलों में दर्ज चुंबकीय रिकॉर्ड का अध्ययन किया गया। इसके माध्यम से उन्होंने यह गणना की है कि पिछले 19 मिलियन वर्षों में कितनी महासागरीय पर्पटी का निर्माण हुआ है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

समुद्र तल का लगभग 140 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से विस्तार या प्रसरण हो रहा है। यह 15 मिलियन वर्ष पहले के प्रति वर्ष 200 मिलीमीटर के औसत विस्तार से कम है।

सभी कटकों में एक समान गति से प्रसरण नहीं हुआ है। कुछ की प्रसरण गति (spreading speed) अधिक तो कुछ की मंद थी।

पूर्वी प्रशांत क्षेत्र के कटकों का प्रसरण 100 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति के साथ मंद था। इससे सागर तल प्रसरण के वैश्विक औसत में कमी आई है।

इस मंद विस्तार के लिए रिपोर्ट में दो कारकों की पहचान की गयी है। पहला, ऊपर उठते पर्वत (growing mountains) और दूसरा, मेंटल से होने वाले संवहन (convection) में परिवर्तन।

मेंटल से होने वाले संवहन के तहत पृथ्वी के आंतरिक भाग से ऊष्मा का परिवहन पृथ्वी की सतह की ओर होता है।

प्रसार

में महामारी विज्ञान , प्रसार के लिए एक विशेष जनसंख्या के अनुपात एक चिकित्सा स्थिति (आमतौर पर किसी बीमारी या एक जोखिम कारक धूम्रपान या सीट बेल्ट उपयोग के रूप में इस तरह के) एक विशिष्ट समय पर से प्रभावित हो पाया है। यह अध्ययन किए गए लोगों की कुल संख्या के साथ स्थिति में पाए गए लोगों की संख्या की तुलना करके प्राप्त किया जाता है, और आमतौर पर प्रति 10,000 या 100,000 लोगों पर एक अंश, प्रतिशत या मामलों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है।

प्रसार एक निश्चित समय में किसी विशेष आबादी में मौजूद रोग के मामलों की संख्या है , जबकि घटना एक निर्दिष्ट समय प्रसार कम है अवधि के दौरान विकसित होने वाले नए मामलों की संख्या है । [१] प्रसार उत्तर देता है "अभी कितने लोगों को यह बीमारी है?" या "इस अवधि के दौरान कितने लोगों को यह रोग हुआ है?"। घटना का जवाब "कितने लोगों ने [एक निर्दिष्ट समय अवधि] के दौरान बीमारी का अधिग्रहण किया?"। हालांकि, गणितीय रूप से, प्रसार घटना के उत्पाद और रोग की औसत अवधि के समानुपाती होता है। विशेष रूप से, जब प्रसार कम होता है (<10%), तो संबंध को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है: [2]

पी आर इ वी ए मैं इ नहीं सी इ = मैं नहीं सी मैं घ इ नहीं सी इ × घ तुम आर ए तो मैं हे नहीं

सावधानी बरती जानी चाहिए क्योंकि यह संबंध केवल तभी लागू होता है जब निम्नलिखित दो शर्तें पूरी होती हैं: १) व्यापकता कम है और २) अवधि स्थिर है (या औसत लिया जा सकता है)। [2]

विज्ञान में, प्रचलन एक अनुपात का वर्णन करता है (आमतौर पर प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है )। उदाहरण के लिए, 2001 में अमेरिकी वयस्कों में मोटापे की व्यापकता का अनुमान यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) द्वारा लगभग 20.9% था। [३]

व्यापकता एक शब्द है जिसका अर्थ है व्यापक होना और यह घटना से अलग है । प्रसार एक विशेष समय में बीमारी से प्रभावित सभी व्यक्तियों का माप है , जबकि घटना नए व्यक्तियों की संख्या का माप है जो किसी विशेष अवधि के दौरान किसी बीमारी का अनुबंध करते हैं। एचआईवी जैसे लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों के बारे में बात करते समय व्यापकता एक उपयोगी पैरामीटर है , लेकिन छोटी अवधि की बीमारियों जैसे चिकनपॉक्स के बारे में बात करते समय घटना अधिक उपयोगी होती है । [ उद्धरण वांछित ]

ज़िंदगी भर प्रचलन में रहना

आजीवन प्रसार (एलटीपी) आबादी में व्यक्तियों का अनुपात है कि उनके जीवन में किसी बिंदु पर (मूल्यांकन के समय तक) एक "मामला" का अनुभव किया है, उदाहरण के लिए, एक बीमारी; एक दर्दनाक घटना; या कोई व्यवहार, जैसे कोई अपराध करना। अक्सर, 12 महीने की व्यापकता (या किसी अन्य प्रकार की "अवधि की व्यापकता") को आजीवन प्रसार के साथ संयोजन में प्रदान किया जाता है। बिंदु प्रसार एक विशिष्ट समय (एक महीने या उससे कम) में विकार की व्यापकता है। आजीवन रुग्ण जोखिम "एक आबादी का अनुपात है जो अपने जीवनकाल में किसी भी समय किसी बीमारी से पीड़ित हो सकता है।" [४] [५]

अवधि की व्यापकता

अवधि की व्यापकता एक विशिष्ट अवधि के दौरान दी गई बीमारी या स्थिति के साथ जनसंख्या का अनुपात है। उदाहरण के लिए, यह वर्णन कर सकता है कि 2006 में ठंड के मौसम में आबादी में कितने लोगों को सर्दी थी। इसे जनसंख्या के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है और इसे निम्न सूत्र द्वारा वर्णित किया जा सकता है:

अवधि की व्यापकता (अनुपात) = किसी निश्चित अवधि में मौजूद मामलों की संख्या इस अवधि के दौरान जनसंख्या में लोगों की संख्या

घटना (दर), बिंदु प्रसार (अनुपात) और अवधि प्रसार (अनुपात) के बीच संबंध को फोटोग्राफी के साथ सादृश्य के माध्यम से आसानी से समझाया गया है। बिंदु प्रसार एक फ्लैशलाइट तस्वीर के समान है: इस समय क्या हो रहा है, समय में जमे हुए। अवधि की व्यापकता एक लंबे एक्सपोजर (एक पल के बजाय सेकंड) फोटोग्राफ के समान होती है: कैमरे के शटर के खुले होने पर फोटो में दर्ज की गई घटनाओं की संख्या। मूवी में प्रत्येक फ्रेम एक इंस्टेंट (बिंदु प्रसार) रिकॉर्ड करता है; एक फ्रेम से दूसरे फ्रेम को देखकर नई घटनाओं (घटनाओं की घटनाओं) को नोटिस करता है और ऐसी घटनाओं की संख्या को एक अवधि (फ्रेम की संख्या) से जोड़ सकता है; घटना दर देखें ।

बिंदु प्रसार

बिंदु प्रसार जनसंख्या में उन लोगों के अनुपात का एक उपाय है, जिन्हें किसी विशेष समय पर कोई बीमारी या स्थिति है, जैसे कि एक विशेष तिथि। यह समय में बीमारी के स्नैपशॉट की तरह है। इसका उपयोग पुरानी बीमारियों की घटना के आंकड़ों के लिए किया जा सकता है । यह अवधि की व्यापकता के विपरीत है जो जनसंख्या में उन लोगों के अनुपात का एक उपाय है, जिन्हें एक विशिष्ट अवधि, जैसे कि एक मौसम, या एक वर्ष में कोई बीमारी या स्थिति है। बिंदु प्रसार को सूत्र द्वारा वर्णित किया जा सकता है: व्यापकता = एक विशिष्ट तिथि पर मौजूदा मामलों की संख्या ÷ इस तिथि पर जनसंख्या में लोगों की संख्या [6]

यह कहा जा सकता है कि बहुत बड़ी संख्या में व्यक्तियों पर लागू एक बहुत छोटी त्रुटि (अर्थात, जो अपने जीवनकाल के दौरान सामान्य आबादी की स्थिति से प्रभावित नहीं होते हैं , उदाहरण के लिए, 95% से अधिक) एक प्रासंगिक, गैर- उन विषयों की नगण्य संख्या जिन्हें गलत तरीके से स्थिति या किसी अन्य स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया गया है जो एक सर्वेक्षण अध्ययन का उद्देश्य है: ये विषय तथाकथित झूठे सकारात्मक हैं; ऐसा तर्क 'झूठी सकारात्मक' पर लागू होता है, लेकिन 'झूठी नकारात्मक' समस्या पर नहीं, जहां हमें शुरू करने के लिए अपेक्षाकृत बहुत कम संख्या में व्यक्तियों पर एक त्रुटि लागू होती है (अर्थात, जो सामान्य आबादी में स्थिति से प्रभावित होते हैं ; उदाहरण के लिए, 5% से कम)। इसलिए, साक्षात्कार में विकार का इतिहास रखने वाले विषयों का एक बहुत अधिक प्रतिशत ऐसी चिकित्सा स्थिति के लिए गलत सकारात्मक है और जाहिर तौर पर कभी भी पूरी तरह से नैदानिक ​​सिंड्रोम का सामना नहीं करना पड़ा । [ उद्धरण वांछित ]

मनोरोग प्रसार कम है शर्तों के सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व का मूल्यांकन करने में एक अलग लेकिन संबंधित समस्या से प्रकाश डाला कर दिया गया है रॉबर्ट स्पिट्जर की कोलंबिया विश्वविद्यालय की पूर्ति: नैदानिक मानदंड और जिसके परिणामस्वरूप निदान जरूरी इलाज की आवश्यकता न दिखाने वाले। [7]

अपेक्षाकृत कम जनसंख्या प्रसार या आधार दर के साथ विकारों और स्थितियों के लिए दरों का पता लगाने पर एक प्रसिद्ध सांख्यिकीय समस्या उत्पन्न होती है । यहां तक ​​​​कि यह मानते हुए कि साक्षात्कार निदान संवेदनशीलता और विशिष्टता और आरओसी वक्र के तहत उनके संबंधित क्षेत्र (यानी, एयूसी , या रिसीवर ऑपरेटिंग विशेषता वक्र के तहत क्षेत्र) के संदर्भ में अत्यधिक सटीक हैं , अपेक्षाकृत कम प्रसार या आधार-दर वाली स्थिति उच्च झूठी सकारात्मक दर प्राप्त करने के लिए बाध्य है , जो झूठी नकारात्मक दरों से अधिक है ; ऐसी परिस्थिति में एक सीमित सकारात्मक भविष्य कहनेवाला मूल्य , पीपीवी, एक विशिष्टता की उपस्थिति में भी उच्च झूठी सकारात्मक दर उत्पन्न करता है जो कि 100% के बहुत करीब है। [8]

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